Monday, 26 September 2016

खांसी के लिए आर्युवेदिक उपचार /

खांसी के लिए आर्युवेदिक उपचार
(चाहे किसी भी प्रकार की हो)

1:- हल्दी पाउडर आधा चम्मच मुह के अंतिम हिस्से में डाले और चुप होकर बैठ जायें 10 मिनट तक
ये धीरे धीरे लार के साथ अंदर चली जायेगी
इससे टांसिल भी ठीक हो जाता है पूर्णरूप से

2:- अदरक और पान
दोनों के एक-एक चम्मच रस
को गर्म करने के बाद उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर चाट ले

3:- अदरक के टूकड़े को तवे या आग में भूनकर उसपर हल्दी डालकर
चूसते रहे
(इससे तो भयानक से भयानक खांसी दूर हो जाती है)

4:- अनार के रस को गर्म करके पीने से भी खांसी ठीक हो जाती है

5:- अमरूद को आग में भूनकर खाने से भी खासी ठीक हो जाती है

6:-हल्दी एक चौथाई चम्मच को गर्म दूध में मिलाकर पीये

7:- काली मिर्च को मुह में डालकर चूसते रहे
इससे भी खांसी दूर होती है

बिच्छू, तंतीया, मधुमक्खी का डंक निकलने का होम्योपैथिक तरीका

बाह्य किट पतंगा कोई भी किसी भी प्रकार के काटने का उपचार

SILICEA -200
liquid form मे
होम्योपैथी की दुकान से ले आए
इसकी एक एक बूंद १० मिनट के अंतराल में जीभ पर डालना है केवल तीन बार
कुछ समय में ही डंक बाहर निकल आयेगा
५ ml घर में लेकर रख ले
ये उन सभी किटपतंगो के लिए है जो बाह्य रूप से काटते हैं
और काटने के बाद डंक अन्दर छोड देते हैं

जैसे बिच्छू, तंतीया, मधुमक्खी
आदि आदि

और ये ही दवा इन सभी कामों में भी पर्योग करते हैं
जैसे सिलाई मशीन की सुई अगुली में फस गई हो
या
काचं टुट कर फस गया हो हाथ या पैर में

नोट :- फ्रिज से और धूप से बचा कर रखें इसे
और शीशी का ढक्कन बंद करके रखें

दातुन करने का शास्त्र

महर्षि वाग्भट (3000 साल पहले भारत मे हुये एक sant 135 वर्ष कि उम्र तक जिये )के अष्टांग हृदयम का कुछ हिस्सा जोड़ता हूँ, जिसमे वो कहते हैं कि दातुन कीजिये |

दातुन कैसा ? तो जो स्वाद में कसाय हो, कसाय समझते हैं आप ? कसाय मतलब कड़वा और नीम का दातुन कड़वा ही होता है और इसीलिए उन्होंने नीम के दातुन की बड़ाई (प्रसंशा) की है |एक दूसरा दातुन बताया है, वो है मदार का, उसके बाद अन्य दातुन के बारे में उन्होंने बताया है जिसमे बबूल है, अर्जुन है, आम है, अमरुद है, जामुन है, ऐसे 12 वृक्षों का नाम उन्होंने बताया है जिनके दातुन आप कर सकते हैं |

चैत्र माह से शुरू कर के गर्मी भर नीम, मदार या बबूल का दातुन करने के लिए उन्होंने बताया है, सर्दियों में उन्होंने अमरुद या जामुन का दातुन करने को बताया है , बरसात के लिए उन्होंने आम या अर्जुन का दातुन करने को बताया है | आप चाहें तो सालों भर नीम का दातुन इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन उसमे बस एक बात का रखे कि तीन महीने लगातार करने के बाद इस नीम के दातुन को 20 दिन का विश्राम दे | इस अवधि में मंजन कर ले | दन्त मंजन बनाने की आसान विधि उन्होंने बताई है, वो कहते हैं कि आपके स्थान पर उपलब्ध खाने का तेल (सरसों का तेल. नारियल का तेल, या जो भी तेल आप खाने में इस्तेमाल करते हों, रिफाइन छोड़ कर ), उपलब्ध लवण मतलब नमक और हल्दी मिलाकर आप मंजन बनाये और उसका प्रयोग करे | दातुन जब भारत के सबसे बड़े शहर मुंबई में मिल जाता है तो भारत का ऐसा कोई भी शहर नहीं होगा जहाँ ये नहीं मिले |

महर्षि वागभट सहिंता

मूंग की दाल खाने से लाभ / benifit of green gram


मूंग -
मूंग से हम सब बहुत अच्छी तरह परिचित हैं | मूंग की दाल द्विदल धान्य है और समस्त दलहनों में अपने विशेष गुणों के कारण अच्छी मानी जाती है | मूंग काले,हरे,पीले,सफ़ेद और लाल अनेक तरह की होती है | रोगियों के लिए मूंग बहुत श्रेष्ठ बताई जाती है | मूंग की दाल से पापड़,बड़ियां व पौष्टिक लड्डू भी बनाये जाते हैं | मूंग की दाल खाने में शीतल व पचने में हलकी होती है |
विभिन्न रोगों में मूंग का उपयोग -

१- चावल और मूंग की खिचड़ी खाने से कब्ज दूर होता है | खिचड़ी में घी डालकर खाने से कब्ज दूर होकर दस्त साफ़ आता है |

२- मूंग को सेंककर पीस लें | इसमें पानी डालकर अच्छी तरह से मिलाकर लेप की तरह शरीर पर मालिश करें | इससे ज्यादा पसीना आना बंद हो जाता है |

३- मूंग की छिलके वाली दाल को दो घंटे के लिए पानी में भिगो दें| इसके बाद इसे पीसकर गाढ़ा लेप दाद और खुजली युक्त स्थान पर लगाएं,लाभ होगा |

४- टाइफाइड के रोगी को मूंग की दाल बनाकर देने से लाभ होता है,लेकिन दाल के साथ घी और मसालों का प्रयोग बिलकुल न करें |

५- मूंग को छिलके सहित खाना चाहिए | बुखार होने पर मूंग की दाल में सूखे आंवले को डालकर पकाएं | इसे रोज़ दिन में दो बार खाने से बुखार ठीक होता है और दस्त भी साफ़ होता है |

हल्दी के औषधीय उपयोग / medicinal use of termeric


एक सर्वज्ञात मसाला हल्दी न केवल खाने में लज्जत और स्वाद देती है वरन यह एक आयुर्वेदिक औषधि भी है। नानी, दादी के फर्स्टएड बॉक्स में यह मुख्य स्थान रखती है। यह निम्न तरीकों से उपयोग में लाई जा सकती है
1. एक गिलास गर्म मीठे दूध में एक चम्मच हल्दी पावडर मिलाकर पीने से शरीर की अंदरूनी चोट ठीक होती है।
2. हल्दी मिला मीठा गर्म दूध सुबह-शाम लगातार पाँच दिन तक पीने से मुँह के छाले ठीक हो जाते हैं।
3. एक चुटकी हल्दी प्रतिदिन लेने से भूख बढ़ती है। इसका सेवन करने से आँतों में भी लाभ पहुँचता है।
4. हल्दी त्वचा के परजीवी जीवाणुओं को नष्ट करती है।
5. हल्दी की गाँठ को पानी के साथ पीसकर लेप तैयार करें और इसका उबटन नहाने से पूर्व लगा लें। एक हफ्ते में आपको त्वचा में निखार लगेगा।
थोड़ी-सी हल्दी में पिसा हुआ कपूर, थोड़ा-सा
सरसों का तेल मिलाकर लेप तैयार करने से त्वचा पर होने वाले रोग दूर हो जाते हैं।
6. दानेदार पिसी हल्दी को ताजी मलाई में भिगोकर चेहरे एवं हाथों पर लगाएँ। सूखने पर रगड़कर निकाल दें। गुनगुने पानी से चेहरा साफ करें। त्वचा खिल उठेगी।
7. बेसन में सरसों का तेल, हल्दी व पानी मिलाकर गाढ़ा लेप तैयार करें। इस घोल को चेहरे व पूरे शरीर पर अच्छी तरह लगाकर सूखने पर निकाल दें। त्वचा चमकदार हो जाएगी।
8. मासिक के समय पेट दर्द के वक्त गरम पानी के साथ हल्दी की फँकी लेने से रक्त प्रवाह ठीक होता है और दर्द से राहत मिलती है।
9. छोटे बच्चों को खाँसी-जुकाम होने पर आधा कप पानी में आधा छोटा चम्मच हल्दी पावडर, थोड़ा- सा गुड़, अजवाइन, एक लौंग मिलाकर उबालें। अच्छी तरह उबल जाने पर छानकर गुनगुना-सा हो तब चम्मच से पिला दें। बच्चे को न केवल सर्दी-जुकाम से राहत मिलेगी, बल्कि पेट में यदि कब्ज होगा तो वह भी ठीक हो जाएगा।
9. मैथी दाने और हल्दी का काढ़ा भी मासिक साफ होने के लिए लिया जा सकता है।
10. सूजन पर हल्दी व चूने का लेप करने से सूजन उतर जाता है।
11. बुजुर्गों का कहना है कि बगैर हल्दी का खाना अपशगुन होता है। दरअसल ऐसा उसके औषधीय गुणों की ही वजह से कहा जाता है।
12. हल्दी एक प्रिजरवेटिव का ही काम करती है,
इसीलिए अचार के मसाले का अभिन्न अंग है।
नवजात शिशु को दिए जाने वाले 'घसारा' अर्थात
'घुट्टी' में आंबा हल्दी भी उसके आयुर्वेदिक गुणों की वजह से ही दी जाती है।
13. तेज जुकाम होने पर हल्दी की धूनी अर्थात गरम जलते कंडे पर हल्दी जलाकर उससे उठने वाले धुएँ को सूँघने से सर्दी-जुकाम से राहत मिलती है।
14. कहा जाता है कि एक चम्मच हल्दी प्रतिदिन सेवन करने से भूख बढ़ती है। अमाशय एवं आँतों की सफाई होती है।
15. कटने या लगने पर रक्तस्राव को रोकने के लिए भी शुद्ध हल्दी पावडर चोट पर लगाया जाता है, जिससे रक्तस्राव तुरंत रुक जाता है।
हल्दी एक अच्छा एंटीसेप्टिक एवं एंटीबायोटिक है, जिसका उल्लेख आयुर्वेद में भी किया गया है।
इस तरह से हमारे घर के रसोईघर में बैठा चिकित्सक हल्दी कई स्वास्थ्य समस्याओं की प्राथमिकचिकित्सा में हमारी मदद करता है। हल्दी हमेशा शुद्ध लें एवं जहाँ तक संभव हो, घर में तैयार करें तो ठीक रहेगा, क्योंकि वह जल्दी असर करेगी। बाजार में उपलब्ध पावडर में रंग मिलने होने की संभावनाएँ होती हैं, जबकि हल्दी स्वयं एक प्राकृतिक रंग है, जो हमारे भोजन को रंगत देती है, स्वाद और खुशबू देती है,जिसके प्रभाव से व्यंजन लज्जतदार लगता है। आयुर्वेद
में इसीलिए हल्दी एक महत्वपूर्ण तत्व है।

Friday, 23 September 2016

एलर्जी का घरेलू उपचार / ayurvedic ways to handle allergy

एलर्जी का घरेलू उपचार
एलर्जी में त्वचा में चुभन , क्खुजली , दाने या पित्ती हो जाती है , जिसकी वजह से घबराहट या बेचैनी होती है .
१. एक गिलास दूध में दो चम्मच हल्दी पौडर डालकर पियें .
२. सूखे अंजीर खाकर ऊपर से चाय पियें .
३. गिलोय आधा चम्मच चूर्ण शहद से चाटें .
४. सोंठ, काली मिर्च और हल्दी उपयोगी है .
५. सूखी पुदीने की पत्तियां अंजीर के साथ लें .
६. गाजर रस में सेंधा नमक डालकर सेवन करें .
७. पुराना गुड खाएं
८. हल्दी और अदरक के टुकड़े चूसें .
९. तुलसी और प्याज का रस एक एक चम्मच और अदरक का रस दो चम्मच को दो चम्मच शहद में मिलकर सेवन करें .
१०. एक चम्मच तुलसी के बीज के चूर्ण में आधा चम्मच शहद मिलकर पिए .
११. चार चम्मच मेथी पानी में उबालकर पियें .
१२. हरसिंगार की छाल चूर्ण को पान में रखकर खाएं .
१३. लौंग , काली मिर्च और तुलसी की पत्तियों के दिन में कई बार सेवन करें।।

बालो को स्वस्थ रखने के आयुर्वेदिक तरीके / aayurvedic ways to keep hair's healthy

बालों के लिये 26 प्रभावशाली उपाय
1) घी खाएं और बालों के जड़ों में घी मालिश करें।
2) गेहूं के जवारे का रस पीने से भी बाल कुछ समय बाद काले हो जाते हैं।
3) तुरई या तरोई के टुकड़े कर उसे धूप मे सूखा कर कूट लें। फिर कूटे हुए मिश्रण में इतना नारियल तेल डालें कि वह डूब जाएं। इस तरह चार दिन तक उसे तेल में डूबोकर रखें फिर उबालें और छान कर बोतल भर लें। इस तेल की मालिश करें। बाल काले होंगे।
4) नींबू के रस से सिर में मालिश करने से बालों का पकना, गिरना दूर हो जाता है। नींबू के रस में पिसा हुआ सूखा आंवला मिलाकर सफेद बालों पर लेप करने से बाल काले होते हैं।
5) बर्रे(पीली) का वह छत्ता जिसकी मक्खियाँ उड़ चुकी हो 25 ग्राम, 10-15 देसी गुड़हल के पत्ते,1/2 लीटर नारियल तेल में मंद मंद आग पर उबालें सिकते-सिकते जब छत्ता काला हो जाये तो तेल को अग्नि से हटा दें. ठंडा हो जाने पर छान कर तेल को शीशी में भर लें. प्रतिदिन सिर पर इसकी हल्के हाथ से मालिश करने से बाल उग जाते हैं और गंजापन दूर होता है.
6) कुछ दिनों तक, नहाने से पहले रोजाना सिर में प्याज का पेस्ट लगाएं। बाल सफेद से काले होने लगेंगे।
7) नीबू के रस में आंवला पाउडर मिलाकर सिर पर लगाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं।
8) तिल का तेल भी बालों को काला करने में कारगर है।
9) आधा कप दही में चुटकी भर काली मिर्च और चम्मच भर नींबू रस मिलाकर बालों में लगाए। 15 मिनट बाद बाल धो लें। बाल सफेद से काले होने लगेंगे।
10) नीम का पेस्ट सिर में कुछ देर लगाए रखें। फिर बाल धो लें। बाल झड़ना बंद हो जाएगा।
11) चाय पत्ती के उबले पानी से बाल धोएं। बाल कम गिरेंगे।
12) बेसन मिला दूध या दही के घोल से बालों को धोएं। फायदा होगा।
13) दस मिनट का कच्चे पपीता का पेस्ट सिर में लगाएं। बाल नहीं झड़ेंगे और डेंड्रफ (रूसी) भी नहीं होगी।
14) 250 ग्राम अमरबेल को लगभग 3 लीटर पानी में उबालें। जब पानी आधा रह जाये तो इसे उतार लें। सुबह इससे बालों को धोयें। इससे बाल लंबे होते हैं।
15) 50 ग्राम कलौंजी 1 लीटर पानी में उबाल लें। इस उबले हुए पानी से बालों को धोएं। इससे बाल 1 महीने में ही काफी लंबे हो जाते हैं।
16) नीम और बेर के पत्तो को पानी के साथ पीसकर सिर पर लगा लें और इसके 2-3 घण्टों के बाद बालों को धो डालें। इससे बालों का झड़ना कम हो जाता है और बाल लंबे भी होते हैं।
17) लहसुन का रस निकालकर सिर में लगाने से बाल उग आते हैं।
18) सीताफल के बीज और बेर के बीज के पत्ते बराबर मात्रा में लेकर पीसकर बालों की जड़ों में लगाएं। ऐसा करने से बाल लंबे हो जाते हैं।
19) 10 ग्राम आम की गिरी को आंवले के रस में पीसकर बालों में लगाना चाहिए। इससे बाल लंबे और घुंघराले हो जाते हैं।
20) शिकाकाई और सूखे आंवले को 25-25 ग्राम लेकर थोड़ा-सा कूटकर इसके टुकड़े कर लें। इन टुकड़ों को 500 ग्राम पानी में रात को डालकर भिगो दें। सुबह इस पानी को कपड़े के साथ मसलकर छान लें और इससे सिर की मालिश करें। 10-20 मिनट बाद नहा लें। इस तरह शिकाकाई और आंवलों के पानी से सिर को धोकर और बालों के सूखने पर नारियल का तेल लगाने से बाल लंबे, मुलायम और चमकदार बन जाते हैं।
21) ककड़ी में सिलिकन और सल्फर अधिक मात्रा में होता है जो बालों को बढ़ाते हैं। ककड़ी के रस से बालों को धोने से तथा ककड़ी, गाजर और पालक सबको मिलाकर रस पीने से बाल बढ़ते हैं। यदि यह सब उपलब्ध न हो तो जो भी मिले उसका रस मिलाकर पी लें। इस प्रयोग से नाखून गिरना भी बन्द हो जाता है।
22) कपूर कचरी 100 ग्राम, नागरमोथा 100 ग्राम, कपूर तथा रीठे के फल की गिरी 40-40 ग्राम, शिकाकाई 250 ग्राम और आंवले 200 ग्राम की मात्रा में लेकर सभी का चूर्ण तैयार कर लें। इस मिश्रण के 50 ग्राम चूर्ण में पानी मिलाकर लुग्दी(लेप) बनाकर बालों में लगाना चाहिए। इसके पश्चात् बालों को गरम पानी से खूब साफ कर लें। इससे सिर के अन्दर की जूं-लींकें मर जाती हैं और बाल मुलायम हो जाते हैं।
23) ,गुड़हल के फूलों के रस को निकालकर सिर में डालने से बाल बढ़ते हैं।
24) गुड़हल के ताजे फूलों के रस में जैतून का तेल बराबर मिलाकर आग पर पकायें, जब जल का अंश उड़ जाये तो इसे शीशी में भरकर रख लें। रोजाना नहाने के बाद इसे बालों की जड़ों में मल-मलकर लगाना चाहिए। इससे बाल चमकीले होकर लंबे हो जाते हैं।
25) बालों को छोटा करके उस स्थान पर जहां पर बाल न हों भांगरा के पत्तों के रस से मालिश करने से कुछ ही दिनों में अच्छे काले बाल निकलते हैं जिनके बाल टूटते हैं या दो मुंहे हो जाते हैं।
26) त्रिफला के चूर्ण को भांगरा के रस में 3 उबाल देकर अच्छी तरह से सुखाकर खरल यानी पीसकर रख लें। इसे प्रतिदिन सुबह के समय लगभग 2 ग्राम तक सेवन करने से बालों का सफेद होना बन्द जाता है तथा इससे आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।

Thursday, 22 September 2016

वात रोग, गठिया, संधिवात, यूरिक एसिड के बढ़ने का उपचार / arthritis, uric acid ayurvedic methods

#वात रोग : का उपचार

वात, पित्त और कफ तीनों में से वात सबसे प्रमुख होता है क्योंकि पित्त और कफ भी वात के साथ सक्रिय होते हैं। शरीर में वायु का प्रमुख स्थान पक्वाशय में होता है और वायु का शरीर में फैल जाना ही वात रोग कहलाता है। हमारे शरीर में वात रोग 5 भागों में हो सकता है जो 5 नामों से जाना जाता है।
वात के पांच भाग निम्नलिखित हैं-
• उदान वायु - यह कण्ठ में होती है।
• अपान वायु - यह बड़ी आंत से मलाशय तक होती है।
• प्राण वायु - यह हृदय या इससे ऊपरी भाग में होती है।
• व्यान वायु - यह पूरे शरीर में होती है।
• समान वायु - यह आमाशय और बड़ी आंत में होती है।
वात रोग के प्रकार :-
आमवात :-
आमवात के रोग में रोगी को बुखार होना शुरू हो जाता है तथा इसके साथ-साथ उसके जोड़ों में दर्द तथा सूजन भी हो जाती है। इस रोग से पीड़ित रोगियों की हडि्डयों के जोड़ों में पानी भर जाता है। जब रोगी व्यक्ति सुबह के समय में उठता है तो उसके हाथ-पैरों में अकड़न महसूस होती है और जोड़ों में तेज दर्द होने लगता है। जोड़ों के टेढ़े-मेढ़े होने से रोगी के शरीर के अंगों की आकृति बिगड़ जाती है।

सन्धिवात :-
जब आंतों में दूषित द्रव्य जमा हो जाता है तो शरीर की हडि्डयों के जोड़ों में दर्द तथा अकड़न होने लगती है।

गाउट :-
गाउट रोग बहुत अधिक कष्टदायक होता है। यह रोग रक्त के यूरिक एसिड में वृद्धि होकर जोड़ों में जमा होने के कारण होता है। शरीर में यूरिया प्रोटीन से उत्पन्न होता है, लेकिन किसी कारण से जब यूरिया शरीर के अंदर जल नहीं पाता है तो वह जोड़ों में जमा होने लगता है और बाद में यह पथरी रोग का कारण बन जाता है।
मांसपेशियों में दर्द :-
इस रोग के कारण रोगी की गर्दन, कमर, आंख के पास की मांस-पेशियां, हृदय, बगल तथा शरीर के अन्य भागों की मांसपेशियां प्रभावित होती हैं जिसके कारण रोगी के शरीर के इन भागों में दर्द होने लगता है। जब इन भागों को दबाया जाता है तो इन भागों में तेज दर्द होने लगता है।

गठिया :-
इस रोग के कारण हडि्डयों को जोड़ने वाली तथा जोड़ों को ढकने वाली लचीली हडि्डयां घिस जाती हैं तथा हडि्डयों के पास से ही एक नई हड्डी निकलनी शुरू हो जाती है। जांघों और घुटनों के जोड़ों पर इस रोग का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है और जिसके कारण इन भागों में बहुत तेज दर्द होता है।

वात रोग के लक्षण :-
• वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर में खुश्की तथा रूखापन होने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के शरीर की त्वचा का रंग मैला सा होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति को अपने शरीर में जकड़न तथा दर्द महसूस होता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के सिर में भारीपन होने लगता है तथा उसके सिर में दर्द होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति का पेट फूलने लगता है तथा उसका पेट भारी-भारी सा लगने लगता है।
• रोगी व्यक्ति के शरीर में दर्द रहता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी के जोड़ों में दर्द होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति का मुंह सूखने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी को डकारें या हिचकी आने लगती है।
वात रोग होने का कारण :-
• वात रोग होने का सबसे प्रमुख कारण पक्वाशय, आमाशय तथा मलाशय में वायु का भर जाना है।
• भोजन करने के बाद भोजन के ठीक तरह से न पचने के कारण भी वात रोग हो सकता है।
• जब अपच के कारण अजीर्ण रोग हो जाता है और अजीर्ण के कारण कब्ज होता है तथा इन सबके कारण गैस बनती है तो वात रोग पैदा हो जाता है।
• पेट में गैस बनना वात रोग होने का कारण होता है।
• जिन व्यक्तियों को अधिक कब्ज की शिकायत होती है उन व्यक्तियों को वात रोग अधिक होता है।
• जिन व्यक्तियों के खान-पान का तरीका गलत तथा सही समय पर नहीं होता है उन व्यक्तियों को वात रोग हो जाता है।
• ठीक समय पर शौच तथा मूत्र त्याग न करने के कारण भी वात रोग हो सकता है।
वात रोग होने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-
• वात रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को अपने हडि्डयों के जोड़ में रक्त के संचालन को बढ़ाना चाहिए। इसके लिए रोगी व्यक्ति को एक टब में गरम पानी लेकर उसमें आधा चम्मच नमक डाल लेना चाहिए। इसके बाद जब टब का पानी गुनगुना हो जाए तब रोगी को टब के पास एक कुर्सी लगाकर बैठ जाना चाहिए। इसके बाद रोगी व्यक्ति को अपने पैरों को गरम पानी के टब में डालना चाहिए और सिर पर एक तौलिये को पानी में गीला करके रखना चाहिए। रोगी व्यक्ति को अपनी गर्दन के चारों ओर कंबल लपेटना चाहिए। इस प्रकार से इलाज करते समय रोगी व्यक्ति को बीच-बीच में पानी पीना चाहिए तथा सिर पर ठंडा पानी डालना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने से रोगी को कम से कम 20 मिनट में ही शरीर से पसीना निकलने लगता है जिसके फलस्वरूप दूषित द्रव्य शरीर से बाहर निकल जाते हैं और वात रोग ठीक होने लगता है।• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए 2 बर्तन लें। एक बर्तन में ठंडा पानी लें तथा दूसरे में गरम पानी लें और दोनों में 1-1 तौलिया डाल दें। 5 मिनट बाद तौलिये को निचोड़कर गर्म सिंकाई करें। इसके बाद ठंडे तौलिये से सिंकाई करें। इस उपचार क्रिया को कम से कम रोजाना 3 बार दोहराने से यह रोग ठीक होने लगता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को लगभग 4 दिनों तक फलों का रस (मौसमी, अंगूर, संतरा, नीबू) पीना चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी को दिन में कम से कम 4 बार 1 चम्मच शहद चाटना चाहिए। इसके बाद रोगी को कुछ दिनों तक फलों को खाना चाहिए।
• कैल्शियम तथा फास्फोरस की कमी के कारण रोगी की हडि्डयां कमजोर हो जाती हैं इसलिए रोगी को भोजन में पालक, दूध, टमाटर तथा गाजर का अधिक उपयोग करना चाहिए।
• कच्चा लहसुन वात रोग को ठीक करने में रामबाण औषधि का काम करती है इसलिए वात रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन कच्चे लहसुन की 4-5 कलियां खानी चाहिए।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को भोजन में प्रतिदिन चोकर युक्त रोटी, अंकुरित हरे मूंग तथा सलाद का अधिक उपयोग करना चाहिए।
• रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम आधा चम्मच मेथीदाना तथा थोड़ी सी अजवायन का सेवन करना चाहिए। इनका सेवन करने से यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में खुली हवा में गहरी सांस लेनी चाहिए। इससे रोगी को अधिक आक्सीजन मिलती है और उसका रोग ठीक होने लगता है।
• शरीर पर प्रतिदिन तिल के तेलों से मालिश करने से वात रोग ठीक होने लगता है।
• रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में धूप में बैठकर शरीर की मालिश करनी चाहिए। धूप वात रोग से पीड़ित रोगियों के लिए बहुत ही लाभदायक होती है।
• वात रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए तिल के तेल में कम से कम 4-5 लहसुन तथा थोड़ी सी अजवाइन डालकर गर्म करना चाहिए तथा इसके बाद इसे ठंडा करके छान लेना चाहिए। फिर इसके बाद इस तेल से प्रतिदिन हडि्डयों के जोड़ पर मालिश करें। इससे वात रोग जल्दी ही ठीक हो जायेगा।

Tuesday, 20 September 2016

कफ और उससे होने वाले रोगों का आयुर्वेदिक उपाय / ayurvedic treatment of disease occuring from cough


"कफ"
यह शरीर आयुर्वेद के मतानुसार त्रिधातु में बंटा है जब तक शरीर में त्रिधातु (बात, पित्त, कफ) समानता की स्थिति में रहत है, वह स्वस्थ रहता है। किन्तु, उनकी असामानता की स्थिति में अनेकों रोगों का जन्म होता है, इस बार हम त्रिधातु के तीसरे अंग कफ के बारे में जारकारी दे रहें हैैं। कफ चिकना, भारी, सफेद, पिच्छिल (लेसदार) मीठा तथा शीतल(ठंडा) होता हैं। विदग्ध(दूषित) होने पर इसका स्वाद नमकीन हो जाता है। कफ से सम्बन्धित तकलीफ लगभग 31 प्रतिशत लोगों को रहती है।
कफ के स्थान, नाम और कर्म
आमाशय में, सिर (मस्तिष्क) में, हृदय में और सन्धियों (जोड़ों) में रहकर शरीर की स्थिरता और पुष्टि को करता ह
1- जो कफ आमाशय में अन्न को पतला करता है, उसे क्लेदन कहते हैं।
2- जो कफ मूर्धि (मस्तिष्क) में रहता है, वह ज्ञानेन्द्रियों को तृप्त और स्निग्ध करता है। इसलिए
उसको स्नेहन कफ कहते हैं।
3- जो कफ कण्ठ में रहकर कण्ठ मार्ग को कोमल और मुलायम रखता है तथा जिव्हा की रस ग्रन्थियों को क्रियाशील बनाता है और रस व ज्ञान की शक्ति उत्पन्न करता है,उसको रसन कफ कहते हैं।
4- हृदय में (समीपत्वेन उरःस्थित)रहने वाला कफ अपनी स्निग्धता और शीतलता से सर्वदा हृदय की रक्षा करता है। अतः उसको अवलम्बन कफ कहते हैं।
5- सन्धियों (जोड़ों) में जो कफ रहता है, वह उन्हें सदा चिकना रखकर कार्यक्षम बनाता है। उसको संश्लेष्मक कफ कहते है।
कफ जनित रोग
1- तन्द्रा
2- अति निद्रा
3- निद्रा
4- मुख का माधुर्य - मुख के स्वाद का मीठा होना
5- मुख लेप - मुख का कफ से लिप्त रहना
6- प्रसेतका - मुख से जल का श्राव होना
7- श्वेत लोकन - समस्त पदार्थो का सफेद दिखना
8- श्वेत विट्कता - पुरीष का श्वेत वर्ण होना
9- श्वेत मूत्रता - मूत्र के वर्ण का श्वेत होना
10- श्वेतड़वर्णता - अंगो के वर्ण का श्वेत होना
11- शैत्यता - शीत प्रतीति
12- उष्णेच्छा - उष्ण पदार्थ और उष्णता की इच्छा
13- तिक्त कामिता - कड़वे और तीखे पदार्थांे की अभिलाषा
14- मलाधिक्य - मल की अधिकता
15- बहुमूत्रता - मूत्र का अधिक आना
16- शुक्र बहुल्यता - वीर्य की अधिकता
17- आलस्य - आलस्य अधिक आना
18- मन्द बुद्धित्व - बुद्धि की मन्दता
19- तृप्ति - भोजनेच्छा का अभाव
20- घर्घर वाक्यता - वर्णांे के स्पष्टोचारण का अभाव तथा जड़ता।
कफ प्रकोप और शमन -
मधुर (मीठा), स्निग्ध (चिकना), शीतल (ठंडा) तथा गुरु पाकी आहारों के सेवन से प्रातःकाल में भोजन करने के उपरान्त में परिश्रम न करने से श्लेष्मा (कफ) प्रकुपित होता है और उपरोक्त कारणों के विपरीत आचरण करने से शान्त होता है।
कफ प्रकृति के लक्षण-
कफ प्रकृति मनुष्य की बुद्धि गंभीर होती है। शरीर मोटा होता है तथा केश चिकने होते हैैं। उसके शरीर में बल अधिक होता हैंे, निद्रावस्था में जलाशयों (नदी, तालाब आदि) को देखता है, अथवा उसमें तैरता है।
कफ रोग निवारक दवायें
1-सर्दी व जुकाम
o-काली मिर्च का चूर्ण एक ग्राम सुबह खाली पेट पानी के साथ प्रतिदिन लेते रहने से सर्दी जुकाम की शिकायत दूर होती है।
o- दो लौंग कच्ची, दो लौंग भुनी हुई को पीसकर शहद में मिलाकर सुबह खाली पेट एवं रात्रि में खाने के आधा घंटे के बाद लें, कफ वाली खांसी में आराम आ जायेगा।
2- श्वासनाशक कालीहल्दी
कालीहल्दी को पानी में घिसकर एक चम्मच लेप बनायंे। साथ ही एक चम्मच शहद के साथ सुबह खाली पेट दवा नित्य 60 दिन खाने से दमा रोग में आराम हो जाता ह
3- कफ पतला हो तथा सूखी खांसी सही हो
शिवलिंगी, पित्त पापड़ा, जवाखार, पुराना गुड़, यह सभी बराबर भाग लेकर पीसें और जंगली बेर के बराबर गोली बनायें। एक गोली मुख में रखकर उसका दिन में दो तीन बार रस चूसंे। यह कफ को पतला करती है, जिससे कफ बाहर निकल जाता है तथा सूखी खांसी भी सही होती है।
4- दमा रोग
20 ग्राम गौमूत्र अर्क में 20 ग्राम शहद मिलाकर प्रतिदिन सुबह खाली पेट 90 दिन तक पीने से दमा रोग में आराम हो जाता है। इसे लगातार भी लिया जा सकता है, दमा, टी.वी. हृदय रोग एवं समस्त उदर रोगों में भी लाभकारी है।
5- कुकुर खांसी
धीमी आंच में लोहे के तवे पर बेल की पत्तियों को डालकर भूनते-भूनते जला डालें। फिर उन्हें पीसकर ढक्कन बन्द डिब्बे में रख लें और दिन में तीन या चार बार सुबह, दोपहर, शाम और रात सोते समय एक माशा मात्रा में 10 ग्राम शहद के साथ चटायें, कुछ ही दिनों के सेवन से कुकुर खांसी ठीक हो जाती हैै। यह दवा हर प्रकार की खांसी में लाभ करती है।
6- गले का कफ
पान का पत्ता 1 नग, हरड़ छोटी 1 नग, हल्दी आधा ग्राम, अजवायन 1 ग्राम, काला नमक आवश्यकतानुसार, एक गिलास पानी में डालकर पकायें आधा गिलास रहने पर गरम-गरम दिन में दो बार पियें । इससे कफ पतला होकर निकल जायेगा। रात्रि में सरसों के तेल की मालिश गले तथा छाती व पसलियांे में करें।
7- खांसी की दवा-
भूरी मिर्च 5 ग्राम, मुनक्का बीज निकला 20 ग्राम, मिश्री 20 ग्राम, छोटी पीपर 5 ग्राम तथा छोटी इलायची 5 ग्राम, इन सभी को पीसकर चने के बराबर गोली बना लें। सुबह एक गोली मुँह में डाल कर चूसें। इसी तरह दोपहर और शाम को भी चूसें। कफ ढ़ीला होकर निकल जाता है और खांसी सही हो जाती है।
8- गला बैठना
दिन में तीन या चार बार कच्चे सुहागे की चने बराबर मात्रा मुंह में डालकर चूसें। गला निश्चित ही खुल जाता है और मधुर आवाज आने लगती है। गायकों के लिए यह औषधि अति उत्तम है।
9- श्वास
पीपल की छाल को रविपुष्य या गुरुपुष्य के दिन सुबह न्यौता देकर तोड़ लाएं और सुखाकर रख लें। माघ पूर्णिमा को बारह बजे रात में कपिला गाय के दूध में चावल की खीर बनाकर उसमें एक चुटकी दवा डाल लें और चांदनी रात में तीन घंटे रखकर मरीज को खिलाएं श्वास रोग के लिए अत्यंत लाभकारी है।